
नागौर: अशिक्षित महिलाएं स्तनपान में आगे, शिक्षित माताएं पीछे
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हमारे नागौर संवाददाता के अनुसार...
शिक्षा को अक्सर बेहतर स्वास्थ्य व्यवहार और जागरूकता का आधार माना जाता है, लेकिन स्तनपान के मामले में तस्वीर बिलकुल उलट नजर आ रही है। जिले सहित प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में जहां कम पढ़ी-लिखी महिलाएं आज भी परंपरागत तरीके से अपने शिशु को जन्म के तुरंत बाद स्तनपान कराना प्राथमिकता मानती हैं, वहीं पढ़ी-लिखी और शहरी महिलाओं में यह प्रवृत्ति तेजी से कम हो रही है। शिक्षित माताएं सुविधा, नौकरी, शरीर की बनावट को लेकर भ्रांतियों या आधुनिक जीवनशैली के चलते शुरुआती दिनों से ही शिशुओं को बोतल का दूध या फार्मूला फीड देना शुरू कर देती हैं। चिकित्सकों का कहना है कि ग्रामीण महिलाएं जहां स्तनपान कराने से जरा भी नहीं हिचकिचातीं, वहीं पढ़ी-लिखी महिलाएं अक्सर बोतल का दूध या फार्मूला फीड देने के बारे में सबसे पहले पूछती हैं। इसका असर न केवल बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है, बल्कि माताओं के स्वास्थ्य पर भी दिखाई दे रहा है।
स्तनपान के स्वास्थ्य लाभ और वर्तमान परिदृश्य
चिकित्सकों के अनुसार जन्म के पहले घंटे के भीतर स्तनपान शुरू करना और छह माह तक केवल मां का दूध देना शिशु के लिए संपूर्ण पोषण, रोग प्रतिरोधक क्षमता और स्वस्थ विकास की सबसे प्रभावी गारंटी है। वहीं स्तनपान से मां में प्रसवोत्तर रक्तस्राव कम होता है। स्तन व अंडाशय के कैंसर का खतरा घटता है। मां और शिशु के बीच भावनात्मक जुड़ाव भी मजबूत होता है। इसके बावजूद आधुनिकता की दौड़ में प्राकृतिक और वैज्ञानिक रूप से सबसे सुरक्षित पोषण का विकल्प पीछे छूटता जा रहा है। 1 से 7 अगस्त तक मनाए जाने वाले ‘विश्व स्तनपान सप्ताह’ के अवसर पर यह स्थिति स्वास्थ्य विभाग और समाज, दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
विश्व स्तनपान सप्ताह और समाज की भूमिका
हर साल 1 अगस्त से 7 अगस्त तक मनाया जाने वाला ‘विश्व स्तनपान सप्ताह’ हमें याद दिलाता है कि भले ही स्तनपान मां का व्यक्तिगत कार्य है, लेकिन इसे सफल बनाना पूरे समाज की जिम्मेदारी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूनिसेफ जीवन के पहले 6 महीनों तक केवल स्तनपान कराने और उसके बाद 2 वर्ष या उससे अधिक समय तक पूरक आहार के साथ स्तनपान जारी रखने की सलाह देते हैं।
समर्थन की आवश्यकता और विशेषज्ञ की राय
कोई भी मां अकेले यह यात्रा पूरी नहीं कर सकती। स्तनपान को बनाए रखने के लिए माताओं को बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, सवैतनिक मातृत्व अवकाश, अनुकूल कार्यस्थल और परिवार के सहयोग की आवश्यकता होती है। विशेषज्ञों के अनुसार स्तनपान के लाभ केवल सामान्य पोषण तक सीमित नहीं हैं, इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) बढ़ती है। प्रसव के तुरंत बाद आने वाला गाढ़ा पीला दूध (कोलस्ट्रम) एंटीबॉडी, श्वेत रक्त कोशिकाओं और सुरक्षात्मक प्रोटीन से भरपूर होता है। यह शिशु के लिए पहले प्राकृतिक टीके की तरह काम करता है। जो आंतों की परत को ढंकता है ताकि सांस और पेट के संक्रमण से बचाव हो सके।
स्तनपान संबंधी भ्रांतियां और सत्य
- भ्रांति: स्तन का आकार दूध की मात्रा तय करता है।
सत्य: स्तन का आकार वसायुक्त ऊतकों से तय होता है, दूध बनाने वाली ग्रंथियों से नहीं। आकार का दूध की मात्रा या आपूर्ति से कोई संबंध नहीं है। - भ्रांति: स्तनपान कराने में बिल्कुल दर्द नहीं होना चाहिए।
सत्य: शुरुआती दिनों में हल्की संवेदनशीलता सामान्य है। हालांकि, तेज या लगातार दर्द होना गलत लैच (पकड़) होने से हो सकता है। - भ्रांति: फार्मूला दूध पीने वाले बच्चे बेहतर सोते हैं, इसलिए मां का दूध पर्याप्त नहीं है।
सत्य: फार्मूला दूध की प्रोटीन संरचना के कारण इसे पचने में अधिक समय लगता है, जिससे बच्चा लंबे समय तक भरा हुआ महसूस करता है। स्तनपान करने वाले बच्चों की नींद का पैटर्न अलग हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मां का दूध पर्याप्त नहीं है।
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Written & Verified By
AbhishekChief Editor
नागौर के युवा पत्रकार और डिजिटल मीडिया विशेषज्ञ। अभिषेक जी को ग्रामीण विकास और स्थानीय समस्याओं के सटीक विश्लेषण का गहरा अनुभव है।