
नागौर के सीलवा में खारा पानी, फिर भी किसान ने उगाए खजूर और सेब
Listen News
Audio Summary
हमारे नागौर संवाददाता के अनुसार... नागौर जिले की बीकानेर सीमा पर स्थित सीलवा गांव, जहाँ पानी बेहद खारा होने के कारण सिर्फ खेजड़ी ही पनप पाती थी, अब एक किसान ने इस धारणा को तोड़ दिया है। भोजराज सारस्वत नामक इस प्रगतिशील किसान ने बंजर और खारे पानी वाले धोरों के बीच खजूर, सेब जैसे फलों की सफलतापूर्वक बागवानी की है, जिससे स्थानीय कृषि परिदृश्य में एक नया अध्याय जुड़ा है।
खारे पानी में खजूर की बंपर पैदावार
भोजराज सारस्वत ने बताया कि उनके खेत का पानी अत्यंत खारा है, जिसका टीडीएस 2200 से अधिक है। ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उन्होंने खजूर की खेती की ओर कदम बढ़ाया। 2016 में शुरुआत के समय पौधों को पानी देने और उन्हें जीवित रखने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन दृढ़ संकल्प और सही प्रबंधन से उन्होंने इन बाधाओं को पार किया। आज उनके बगीचे में लगभग 100 खजूर के पेड़ हैं, जिनसे प्रति वर्ष लगभग 100 क्विंटल खजूर का उत्पादन होता है। इस खजूर की फसल से उन्हें सालाना 6 लाख रुपये के करीब आय प्राप्त हो रही है।
जैविक खेती और विविध फलों की बागवानी
खजूर के अलावा, भोजराज सारस्वत ने अपने खेत में विभिन्न प्रकार के फलों और पौधों की बागवानी की है। उनके बाग में सेब, बेर (50 पेड़), अनार (50 पेड़), अमरूद (5 पेड़), गूंदा (48 पेड़), बील (5 पेड़), वट वृक्ष, सीता, अशोक, आंवला, कल्प वृक्ष, काला जामुन, चीकू, शहतूत, सहजल, थार खेजड़ी, एलोवेरा, मौसमी, किन्नू, शीशम, नीम, आड़ू, पीपल, खारी बादाम, केरूंदा, मीठा नीम, नागौरी आसकंद, अडूसा, साटा आदि के पेड़-पौधे भी लहलहा रहे हैं। इन सभी से उन्हें प्रति वर्ष लाखों रुपये की अतिरिक्त आय होती है।
कीटनाशकों से दूरी, जैविक खाद का प्रयोग
भोजराज सारस्वत की एक खास बात यह है कि उन्होंने आज तक अपने बाग के पेड़ों पर किसी भी प्रकार के रासायनिक कीटनाशक का छिड़काव नहीं किया है। इसके स्थान पर, वे नीम की पत्तियां, गुड़, छाछ, गोमूत्र और गोबर को पानी में मिलाकर एक प्रभावी जैविक खाद तैयार करते हैं। इस जैविक खाद के प्रयोग से न केवल पौधों को उत्तम पोषण मिलता है, बल्कि वे कीड़ों के प्रकोप से भी सुरक्षित रहते हैं। सिंचाई की व्यवस्था के लिए उन्होंने तीन फार्म पौंड का निर्माण भी करवाया है।
सरकारी अनुदान और अतिरिक्त आय
बाग में लग रहे खजूर मुख्य रूप से 'बराही' किस्म के हैं, जो अपने स्वाद के लिए जाने जाते हैं। फलदार होने तक प्रत्येक पौधे पर लगभग 3200 रुपये का खर्च आया, जिसमें से 2600 रुपये सरकार की ओर से अनुदान के रूप में प्राप्त हुए। इसके अतिरिक्त, भोजराज सारस्वत खजूर के पेड़ों की जड़ों से नए पौधे तैयार करते हैं। वे सालाना 30-35 नए पौधे तैयार करके उन्हें 1500 रुपये प्रति पौधे की दर से बेचते हैं, जिससे उन्हें एक और अच्छी आय प्राप्त हो रही है।
📲 खबर पसंद आई?
अपने दोस्तों के साथ शेयर करें!

Written & Verified By
AbhishekChief Editor
नागौर के युवा पत्रकार और डिजिटल मीडिया विशेषज्ञ। अभिषेक जी को ग्रामीण विकास और स्थानीय समस्याओं के सटीक विश्लेषण का गहरा अनुभव है।