
नागौर: करोड़ों के बजट के बाद भी सड़कों पर बालश्रम और भीख मांगने को मजबूर बच्चे
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हमारे नागौर संवाददाता के अनुसार, जिले में बाल संरक्षण के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं, बावजूद इसके धरातल पर स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है। अनाथ, निराश्रित और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों के लिए संचालित राजकीय एवं गैर-राजकीय बाल देखरेख संस्थानों पर भारी भरकम बजट खर्च करने के बाद भी, शहर की सड़कों और चौराहों पर मासूम बच्चे भीख मांगते और बालश्रम करते हुए देखे जा सकते हैं।
सरकारी बजट और जमीनी हकीकत
आंकड़ों पर गौर करें तो प्रदेश में संचालित 40 राजकीय बाल देखरेख गृहों पर प्रतिवर्ष 33 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा रहे हैं। इसके अलावा, गैर-राजकीय संस्थानों को भी सालाना 16 से 19 करोड़ रुपये तक का अनुदान दिया जाता है। हैरानी की बात यह है कि एक तरफ इन संस्थानों में निर्धारित क्षमता के अनुरूप बच्चे नहीं पहुंच रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ शहर के मुख्य सार्वजनिक स्थानों पर बच्चों का बचपन दम तोड़ रहा है।
- प्रमुख हॉटस्पॉट: नागौर शहर के रेलवे स्टेशन, मानासर चौराहा, वाटर वर्क्स चौराहा, मंडी तिराहा और पुराना व रोडवेज बस स्टैंड पर बड़ी संख्या में बच्चे भीख मांगते देखे जा सकते हैं।
- बालश्रम का जाल: कच्ची बस्तियों में बच्चे कचरा बीनने और स्थानीय होटलों व ढाबों पर बालश्रम करने को विवश हैं।
- प्रशासनिक उदासीनता: जिम्मेदार विभाग केवल कभी-कभार खानापूर्ति वाली कार्रवाई कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं।
सुधार के लिए समन्वय की दरकार
विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि बाल संरक्षण केवल संस्थानों को फंड देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इन बच्चों की पहचान, बचाव, पुनर्वास और उन्हें शिक्षा से जोड़ने के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग, श्रम विभाग, पुलिस और स्थानीय प्रशासन के बीच एक मजबूत समन्वय की आवश्यकता है। बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब तक निरंतर निगरानी नहीं होगी, तब तक चलाए गए अभियान महज औपचारिकता बनकर रह जाएंगे।
फिलहाल, जिला प्रशासन ने यह आश्वासन दिया है कि बालश्रम व भिक्षावृत्ति में लिप्त बच्चों को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए आगामी दिनों में प्रभावी कदम उठाए जाएंगे और संबंधित अधिकारियों को इस दिशा में कड़ी कार्रवाई के लिए निर्देशित किया जाएगा।
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Written & Verified By
AbhishekChief Editor
नागौर के युवा पत्रकार और डिजिटल मीडिया विशेषज्ञ। अभिषेक जी को ग्रामीण विकास और स्थानीय समस्याओं के सटीक विश्लेषण का गहरा अनुभव है।