
प्रेरणादायक: नागौर की एक टीचर ने 1000 बच्चों को दिलाई शिक्षा की रोशनी
Posted on 29 जुलाई 2026
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गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर, जहाँ हम अपने गुरुओं को नमन करते हैं, वहीं राजस्थान की दो ऐसी विभूतियों की कहानियाँ सामने आई हैं, जिन्होंने शिक्षा के प्रति अपने समर्पण से अनगिनत जिंदगियों को संवारा है। ये वे गुरु हैं जिन्होंने बिना किसी फीस की अपेक्षा के, ज्ञान की ज्योति जलाकर समाज में सकारात्मक बदलाव लाया है।
बाल श्रमिकों को बनाया विद्यार्थी: एक माँ का संघर्ष
हमारे **नागौर** संवाददाता के अनुसार, राजस्थान में ऐसी कई कहानियाँ हैं जो शिक्षा के महत्व को दर्शाती हैं। जयपुर की एक सरकारी शिक्षिका, शिल्पी शाह, ऐसी ही एक प्रेरणादायक मिसाल हैं। उन्होंने कच्ची बस्तियों में जाकर उन बाल श्रमिकों को ढूंढा जिन्होंने किन्हीं कारणों से स्कूल छोड़ दिया था। शिल्पी ने न केवल उन बच्चों के माता-पिता को शिक्षा के महत्व के बारे में समझाया, बल्कि उन्हें फिर से स्कूल की दहलीज तक लाने में भी सफल रहीं।
शिल्पी शाह की अपनी यात्रा भी संघर्षों से भरी रही। एक ऐसे घर में पली-बढ़ीं जहाँ बेटियों की पढ़ाई को विशेष महत्व नहीं दिया जाता था, उन्होंने अपनी मां के सहयोग से शिक्षा प्राप्त की। एक बिजनेसमैन से शादी के बाद मुंबई में बसने के बावजूद, पति के बीमार पड़ने और व्यापार में घाटा आने के बाद उन्होंने हार नहीं मानी। अपनी शिक्षा को ही अपना हथियार बनाते हुए, उन्होंने प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने के साथ-साथ सरकारी शिक्षक बनने की तैयारी की और आखिरकार राजस्थान शिक्षक भर्ती में चयनित हुईं।
'बच्चों को चुराने आई है' अफवाह से लेकर 1000 बच्चों को स्कूल पहुंचाने तक का सफर
एक दिन स्कूल जाते समय, सड़क किनारे खेलते हुए बच्चों को देखकर शिल्पी के मन में सवाल उठा कि क्या शिक्षा उनका अधिकार नहीं है? उन्होंने बच्चों और उनके परिवारों से संपर्क साधने की कोशिश की, लेकिन शुरुआती दिनों में उन्हें 'बच्चों को चुराने आई औरत' जैसी अफवाहों और अपमान का भी सामना करना पड़ा। परंतु, वे डटी रहीं। रोज बस्ती जाकर, बच्चों के साथ समय बिताकर, उनके माता-पिता की परेशानियां सुनकर, उन्होंने धीरे-धीरे विश्वास जीता।
आज, उनकी मेहनत रंग लाई है। शिल्पी शाह ने 1000 से ज्यादा बच्चों को फिर से स्कूल भेजना शुरू करवाया है। उन्होंने सामाजिक सहयोग से कई सरकारी स्कूलों की मरम्मत करवाई, अतिरिक्त कमरे बनवाए, और बच्चों के लिए किताबें व स्कूल बैग भी उपलब्ध करवाए हैं। बड़े हो चुके बच्चों के लिए वे स्किल डेवलपमेंट पर भी काम कर रही हैं।
व्यक्तिगत जीवन का संघर्ष और प्रेरणा
शिल्पी के जीवन का एक और कठिन दौर तब आया जब 7 साल पहले उनके पति का निधन हो गया। इस मुश्किल घड़ी में भी उन्होंने खुद को संभाला और अपने बेटे की शिक्षा पर पूरा ध्यान दिया। आज उनका बेटा IAS की ट्रेनिंग कर रहा है। शिल्पी का मानना है कि उन्होंने अपने बेटे को सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, बल्कि लोगों का दर्द समझना भी सिखाया है।
यह कहानी उन सभी शिक्षकों के लिए एक प्रेरणा है जो समाज में शिक्षा के प्रसार के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं। यह दर्शाती है कि दृढ़ संकल्प, सहानुभूति और समर्पण से किसी भी चुनौती को पार किया जा सकता है और अनगिनत जिंदगियों में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।
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Written & Verified By
AbhishekChief Editor
नागौर के युवा पत्रकार और डिजिटल मीडिया विशेषज्ञ। अभिषेक जी को ग्रामीण विकास और स्थानीय समस्याओं के सटीक विश्लेषण का गहरा अनुभव है।