
मेड़ता: डांगावास हत्याकांड में 11 साल बाद फैसला, सभी 40 आरोपी बरी
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हमारे मेड़ता संवाददाता के अनुसार, नागौर जिले के डांगावास कस्बे में हुए बहुचर्चित हत्याकांड मामले में लगभग 11 साल, 2 महीने और 22 दिन बाद बुधवार को मेड़ता के अनुसूचित जाति-जनजाति विशिष्ट न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया। इस मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने 40 लोगों को आरोपी बनाकर जेल भिजवाया था। न्यायाधीश आशीष बिजराणियां ने विधि सम्मत साक्ष्य के अभाव का हवाला देते हुए सभी 40 अभियुक्तों को बरी कर दिया। फैसले के दौरान कोर्ट परिसर में दोनों पक्षों के काफी लोग मौजूद रहे, जिसे देखते हुए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे।
पीड़ित परिवार ने न्यायालय के इस फैसले पर असंतोष व्यक्त करते हुए राजस्थान उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने की बात कही है। पीड़ित पक्ष का मुख्य सवाल यह है कि यदि सभी आरोपी बरी कर दिए गए हैं, तो फिर 6 लोगों की हत्या का जिम्मेदार कौन है?
न्यायालय के मुख्य बिंदु:
- न्यायालय ने सभी 40 अभियुक्तों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया।
- अपील अवधि तक धारा 437-ए सीआरपीसी के प्रावधानों के तहत प्रत्येक अभियुक्त से 50 हजार रुपए का व्यक्तिगत बंधपत्र और 50 हजार रुपए का प्रतिभूति पत्र लेने के आदेश दिए गए हैं।
- प्रकरण से जुड़े आर्टिकल संख्या 1 से 75 तक की सभी सामग्री को सुरक्षित रखने के निर्देश दिए गए।
- विवादित जमीन के खातेदारी संबंधी अधिकार प्रभावित नहीं होंगे और संबंधित पक्षकारों के सिविल एवं राजस्व अधिकार सक्षम न्यायालय में खुले रहेंगे।
- पीड़ित पक्ष एवं मृतकों के आश्रितों को धारा 357-ए के तहत राजस्थान पीड़ित प्रतिकर योजना के अनुसार उचित मुआवजा निर्धारित करने के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के समक्ष आवश्यक कार्रवाई करने के आदेश दिए गए।
न्यायाधीश की महत्वपूर्ण टिप्पणी:
न्यायाधीश आशीष बिजारणियां ने फैसले में स्पष्ट किया कि यद्यपि अभियुक्त दोषमुक्त हो रहे हैं, फिर भी यह तथ्य निर्विवाद रूप से सिद्ध है कि 14 मई 2015 की घटना में पांच व्यक्तियों की मृत्यु हुई थी और अनेक लोग गंभीर रूप से घायल हुए। उन्होंने कहा कि दोषमुक्ति का यह अर्थ नहीं है कि अपराध घटित ही नहीं हुआ। इसका अर्थ केवल यह है कि उसे कारित करने वाले व्यक्ति विधिसम्मत साक्ष्य द्वारा अभिनिश्चित नहीं हो सके। ऐसी स्थिति में, पीड़ितों एवं मृतकों के आश्रितों को धारा 357-क दंड प्रक्रिया संहिता, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) नियम 1955 के नियम 12 (4) एवं अनुसूची तथा राजस्थान पीड़ित प्रतिकार स्कीम के उपबंधों के अंतर्गत समुचित प्रतिकर अवधारित किए जाने के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को सिफारिश के साथ निर्देशित किया जाता है।
बचाव पक्ष और पीड़ित परिवार की प्रतिक्रिया:
अभियुक्त पक्ष के अधिवक्ता महेंद्र चौधरी ने कहा कि सीबीआई ने इस जांच में कई त्रुटियां की थीं। उन्होंने दावा किया कि परिवादी पक्ष द्वारा जिस जमीन पर घटना की बात कही गई, वह उनकी नहीं थी। जमीन का रजिस्टर्ड बेचान घीसाराम को किया गया था, और घीसाराम से यह जमीन जिमनाराम ने रजिस्टर्ड बेचाननामे से ली थी। केवल उसके नाम से म्यूटेशन दर्ज नहीं हुआ था। इसी वजह से कुछ लोगों ने जमीन पर कब्जा करने का प्रयास किया, जिसके दौरान समझाइश के प्रयासों के बीच मारपीट हुई और दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से हत्याएं हो गईं। अधिवक्ता ने यह भी कहा कि जिन 40 लोगों को आरोपी बनाया गया था, वे घटना में शामिल नहीं थे।
दूसरी ओर, मृतक के रिश्तेदार गोविंदराम मेघवाल ने कहा कि कोर्ट का फैसला सर्वमान्य है, लेकिन हमारी टीम का मानना है कि कोर्ट को शायद आधी-अधूरी जानकारी मिली है। हमारा सवाल बरकरार है कि अगर 40 आरोपियों को बरी कर दिया गया है, तो फिर 6 जनों की हत्या किसने की? पीड़ित परिवार न्याय के लिए अपनी लड़ाई जारी रखने और उच्च न्यायालय में अपील करने के लिए प्रतिबद्ध है।
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Written & Verified By
AbhishekChief Editor
नागौर के युवा पत्रकार और डिजिटल मीडिया विशेषज्ञ। अभिषेक जी को ग्रामीण विकास और स्थानीय समस्याओं के सटीक विश्लेषण का गहरा अनुभव है।