
मेड़ता: डांगावास हत्याकांड में 11 साल बाद बड़ा फैसला, सभी 40 आरोपी बरी
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हमारे मेड़ता संवाददाता के अनुसार, नागौर जिले के बहुचर्चित डांगावास हत्याकांड मामले में 11 साल से अधिक समय बाद आखिरकार बुधवार को अनुसूचित जाति-जनजाति विशिष्ट न्यायालय, मेड़ता ने अपना अहम फैसला सुनाया। न्यायालय ने इस हत्याकांड के सभी 40 आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। हालांकि, न्यायाधीश आशीष बिजारनियां ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यद्यपि अभियुक्त दोषमुक्त हो रहे हैं, तथापि यह तथ्य निर्विवाद रूप से सिद्ध है कि 14 मई 2015 की इस घटना में पांच व्यक्तियों की मृत्यु हुई थी और अनेक व्यक्ति गंभीर रूप से आहत हुए थे।
कोर्ट का अहम अवलोकन
न्यायालय ने अपने फैसले में यह रेखांकित किया कि दोषमुक्ति का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि अपराध घटित ही नहीं हुआ। इसका अर्थ मात्र इतना है कि घटना को अंजाम देने वाले व्यक्ति विधिसम्मत साक्ष्य द्वारा अभिनिश्चित नहीं हो सके। इस फैसले के दौरान मेड़ता कोर्ट परिसर के बाहर दोनों पक्षों के बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद थे, जिसके चलते एहतियातन पुलिस जाब्ता तैनात रहा। पीड़ित पक्ष ने इस फैसले के खिलाफ राजस्थान उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने की बात कही है।
न्यायाधीश आशीष बिजारनियां ने अपने फैसले में मृतकगण के आश्रितों और पीड़ितगण के लिए महत्वपूर्ण निर्देश भी दिए हैं। उन्होंने कहा कि:
- पीडि़तगण एवं मृतकगण के आश्रितगण, धारा 357-क दंड प्रक्रिया संहिता के तहत प्रतिकार के हकदार हैं।
- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) नियम 1955 के नियम 12 (4) एवं अनुसूची के प्रावधान लागू होंगे।
- राजस्थान पीडि़त प्रतिकार स्कीम के उपबंधों के अंतर्गत समुचित प्रतिकार अवधारित किए जाने के लिए प्रकरण को संस्तुति सहित जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्दिष्ट किया जाता है।
क्या था डांगावास हत्याकांड?
डांगावास में गत 14 मई 2015 को जमीन के मालिकाना हक को लेकर खूनी संघर्ष छिड़ गया था। इस भयानक घटना में एक गुट के पांच सदस्यों को ट्रैक्टर से कुचलकर मार दिया गया था, जबकि एक अन्य युवक की भी मारपीट कर हत्या कर दी गई थी, जिससे कुल छह लोगों की मौत हुई थी। यह घटना नागौर जिले में कानून व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई थी।
जांच और न्यायिक प्रक्रिया
इस हत्याकांड के बाद वर्ष 2015 में स्थानीय पुलिस ने कुछ मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक अभिरक्षा में भेजा था। बाद में राजस्थान सरकार ने इस प्रकरण की जांच सीआईडी को सौंप दी थी। पीड़ित परिवार की लगातार मांग पर आखिरकार मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपी गई। सीबीआई ने करीब 2 साल तक मामले की गहन तफ्तीश की और चार्जशीट पेश करने के साथ ही फरार अन्य आरोपियों की भी धरपकड़ की।
वर्ष 2019 में राजस्थान उच्च न्यायालय ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए फरार आरोपियों को पकड़ने के लिए ट्रायल को तीन महीने रोकने और सीबीआई को सख्त आदेश दिए। इसके बाद पुलिस की विशेष टीमों ने दबिश देकर शेष 40 आरोपियों को न्यायिक अभिरक्षा में भिजवाया था।
अभियुक्त पक्ष का तर्क
अभियुक्त पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कमल कुमार आचार्य, एडवोकेट महिपाल लटियाल, एडवोकेट महेंद्र चौधरी व एडवोकेट बाबूलाल गोरा ने पैरवी की। दूसरी ओर, परिवादी की ओर से सीबीआई, दिल्ली के लोक अभियोजक ने पैरवी की। अभियुक्त पक्ष के अधिवक्ता महेंद्र चौधरी ने बताया कि सीबीआई ने अपनी जांच में कई त्रुटियां की थीं। उन्होंने दावा किया कि परिवादी पक्ष द्वारा जमीन पर अपनी मिल्कियत का दावा गलत था और यह जमीन उनकी नहीं थी। उन्होंने बताया कि यह जमीन रजिस्टर्ड बेचाननामे के जरिए घीसाराम को बेची गई थी, जिससे बाद में जिमनाराम ने इसे खरीदा था।
अब इस फैसले के बाद पीड़ित पक्ष की निगाहें उच्च न्यायालय पर टिकी हुई हैं, जहां वे न्याय की अगली उम्मीद लेकर पहुंचेंगे।
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Written & Verified By
AbhishekChief Editor
नागौर के युवा पत्रकार और डिजिटल मीडिया विशेषज्ञ। अभिषेक जी को ग्रामीण विकास और स्थानीय समस्याओं के सटीक विश्लेषण का गहरा अनुभव है।